गाँव की सुबह(village's morning)
गाँव की सुबह को याद करना भी एक सुकूँ सा होता हैं। हम गाँव से निकल दूर शेहेर में हैं,लेकिन अपने में से गाँव को निकालना संभव नहीं हैं।वहाँ कि सुबह अलार्मों और अखबारों से नहीं,बल्कि मुर्गों कि बांग और मवैसियों कि आवाज़ों से होती हैं।
सुबह उठते ही आँख मलते मलते अपने उम्र के साथियों के साथ,अपने हिसाब से पूरब,पश्चिम्,उत्तर या दक्षिण की ओर सैर पे निकल जाना अपने आप में किसी भ्रमण से कम नहीं हैं। और यह भ्रमण गाँव में रोज सुबह देखने को मिलता हैं।
दांत धोने के लिए ब्रश और पेस्ट की नहीं बल्कि दंतवन का जुगार होता हैं वहाँ। जो कि बिल्कुल मुफ्त में बाँसबारी और सहुर् या नीम के पेड़ से आसानी से तोर लाते हैं।
उसके बाद गरमा-गर्म दुधवाली चाय और रात कि बनी बासी रोटी।इसका जो स्वाद होता है ना, शायद दुनिया के किसी भी रेस्टोरेंट के चाय ब्रेड में इस स्वाद का तोर नहीं मिल मिल सकता। कभी मौका मिले तो गाँव की सुबह का आनंद जरूर लीजियेगा।


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