चक्का- गाड़ी का खेल(बचपन की यादें) (game of flywheel) (childhood memories)
हमारे ब्लॉग में आप सभी का स्वागत है। आज इस ब्लॉग में हम आप सभी को बचपन में गाँव में खेले जाने वाले चक्का-गाड़ी खेल के बारे में बतायेंगे। इस खेल को बचपन में मैंने भी खेला हैं।
सुबह नास्ता के बाद जब घर से बाहर जाने लगता तो घरवाले पूछते कहाँ जा रहे हो। तो मेरा जवाब होता था चक्का-गाड़ी खेलने।
और जब भी मैं घर से बाहर निकलता तो घरवाले बस यही प्रश्न पूछते थे और हर बार मेरा जवाब यही होता चक्का-गाड़ी खेलने जा रहा हूं।
चक्का-गाड़ी बोलिये या गाड़ी-चक्का बोलिये बात समान हैं। ज्यादातर यह खेल 4-8 वर्ष के बच्चे ही खेलते हैं। और मैंने उन वर्षो का लगभग 75 प्रतिशत इसी खेल में बिताया होगा शायद।
अब हम आपको बतायेंगे यह चक्का- गाड़ी का खेल होता कैसे था हमारे बचपन के समय में।
हमलोग एक महोल्लें के बच्चे परोसी महोल्लें के बच्चो के साथ,चक्का- गाड़ी को वापस में लड़ाते थे और जिसका चक्का- गाड़ी सबसे मजबूत होता था वह जीत जाता था।
यह उसी तरह था या हैं जैसे आजकल लोग मस्ती के लिए अपने मोटर साइकिल और ट्रैक्टर आदि वाहनों का प्रदर्शन करते हैं और वापस में लड़ाते भी हैं।
आपलोगों के मन में यह जानने की उत्सुकता जरूर होगी कि यह चक्का- गाड़ी हमलोग बनाते कैसे थे।
चक्का- गाड़ी प्रायः सोनठी और घर में परे पुराने चप्पल के उपयोग से बनाया जाता था।
लेकिन चक्का- गाड़ी को ज्यादा मजबूत बनाने के लिए सोनठी के जगह हमलोग बांस के लाठी का भी उपयोग करते थे।
आपलोग पटवा या पटसन तो जानते ही होंगे। पटसन का उपयोग प्रायः रस्सी और बोरा बनाने के लिए किया जाता हैं ।
पटुआ का फसल जब परिपक्व हो जाते है तो उसे काटकर कुछ दिनों के लिए पोखर या नदी के पानी में गोर दिया जाता हैं ताकि पटसन को पटुआ में से बाहर किया जा सके।
पटसन को बाहर निकालने के बाद जो शेष बचता हैं उसे ही संठी कहा जाता हैं।
मुझे विश्वास हैं कि अब आप संठी के बारे में जान गए होंगे। गाँव में संठी का उपयोग ईंधन के रूप में खाना बनाने के लिए भी किया जाता हैं।
अब आगे बढ़ते हैं। चप्पल को काटकर चक्का बनाया जाता था। पहिया को ही चक्का बोला जाता हैं।लेकिन हमलोग तब इसे चक्का ही बोलते थे।
चक्का बन जाने के बाद हमलोग गुठका बनाते थे,जो संठी को सिल्ली के रूप में काटकर बनाते थे। और इस गुठका को चक्का के केंद्र में लगा दिया जाता था। जो काम गाड़ी के पहिए में बॉयरिंग का होता हैं वही समान काम हमारे चक्का- गाड़ी में गुठका का होता था।
अगर हम चक्के की संख्या की बात करे तो हम दो चक्के का प्रयोग करते थे।
चक्का मोटा या पतला होता था जोकि चप्पल पर निर्भर करता था। अगर चप्पल पतला हो तो चक्का पतला बनता था और यदि मोटा हो तो चक्का मोटा बनता था।
अब हम लोग धूरी बनाते थे जो कि संठी से ही बनायी जाती थी। धुरी कि लंबाई लगभग 6-8 इंच होती थी।
उसके बाद चक्का को कर्ची (जो की बांस की पतली तिल्ली से बनाते थे) की सहायता से धुरी में लगाया जाता था। यह कर्ची यहाँ पे स्पेंडेल के रूप में कम करता था। यहाँ तक लगभग हमारा आधा काम हो जाता था।
उसके बाद एक सीधा सिडोल लगभग 6 फीट का संठी लेते थे। जोकि गाड़ी के बॉडी के रूप में काम करती थी।
अब इस संठी के डंटे के एक सिरे को धुरी के केंद्र से कर्ची कि सहायता से जोड़ा जाता था।
इस डंडे के दूसरे सिरे से ही चक्का-गाड़ी नियंत्रित होता था। यह हैंडल के रूप में काम करता था।
हमारे बचपन के इस चक्का- गाड़ी में कोई इंजन नहीं होती थी हम इसके अंतिम सिरे को पकड़कर घरकाते थे l
अगर दाहिना मोरना हो तो हाथ की कलाई को दाई मोड़ते थे और अगर बाई मोड़ना ho तो ठीक इसके उल्टा।
चक्का- गाड़ी आगे आगे और उसका संचालक (जो कि हमलोग हुआ करते थे) उनके पीछे पीछे।
इसमें कोई ब्रेक और एक्सईलेटर नहीं होता था या है। इसके ब्रेक और एक्सईलेटर भी हमी थे। हम रुके तो ये भी रुक जाता ।
मगर हमेशा हमसे आगे ही रहता था। अगर इसकी स्पीड बढ़ानी हो तो आपको अपनी स्पीड बढ़ानी होगी यानी आपको दोड़ना हैं।
चक्का- गाड़ी जब बनकर तैयार हो जाता तो हमलोग चक्का- गाड़ी लड़ाने और प्रदर्शन करने का समय निर्धारित करते थे। और परोसी बस्ती को इसकी सूचना दे दी जाती थी जिससे वो अपना चक्का- गाड़ी लेकर आये।
हमलोग इसे सुंदर दिखाने के लिए इसके बॉडी को अलग- अलग रंग से रँगते थे और इसके टायर मे भी ब्लेड की सहायता से डिज़ाइन भी करते थे।
जिनका गाड़ी जीत जाता था उसके चक्का- गाड़ी को सबसे मजबूत माना जाता था।
आजकल के बच्चे ये सब खेल कहाँ खेल पाते हैं। शायद उनको हमलोग से अच्छा वातावरण मिल गया हैं। उन्हें तो अब उस उम्र में मोबाइल दिया जाता हैं। जिसमे वो अपना पुरा बचपन गवा देते हैं।
शायद इसी कारण आज कल के बच्चो के मस्तिस्क का अच्छे से विकास नहीं हो पाता हैं।
आपलोग को यह ब्लॉग कैसा लगा कॉमेंट सेक्शन में जरूर बताईयेगा और साथ ही अपने बचपन लम्हो को याद कीजिये और हमको बताईये।
धन्यवाद!


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