सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना
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*जब एक लड़की अपने पति से कही होगी कि उसके साथ रेप हुआ है* वो भी एक नहीं कई बार तो सोचिये उसके पति की मनःस्थिति क्या रही होगी। कहने से पहले उसके अंदर चले होंगे कितने द्वंद। कितना प्रश्न किया होगा उसने खुद से।
_कहीं ऐसा तो नहीं कि मुझे छोड़ दे?_
_कहीं ऐसा तो नहीं कि मेरे ऊपर का उसका विश्वास ही खत्म हो जाये?_
_कैसे मिलाऊंगी उससे नज़र ?_
_कैसे लेटूंगी उसके साथ फिर एक ही बिस्तर पर?_
_कैसे बचाऊँगी अपना स्वाभिमान ?_
*_क्या कहेगा समाज!_*
_कहीं निकाले न मुझमें ही कमी !_
_अगर मुझे ही ग़लत समझ लिया तो!_
_क्या रह जायेगा ये घर एक घर जिसमें रहते थे हम?_
*_अगर वह मुझपर विश्वास भी कर ले तो_*
_क्या बीतेगी एक पति को सुनकर कि जिसके नाम पर सिर उठाकर वह चलता था समाज में। सीना ठोक कर कहता थी कि मैं उसका पति हूँ वो मेरी पत्नी नहीं।_
_अब कैसे चलेगा समाज में वह!_
_कितनों को देगा सफ़ाई..... कि क्या हुआ था मेरे साथ!_
*कैसे कहा होगा उसने अपने पिता से* जिसका सपना था उसे देश का नाम रोशन करने का उसकी बेटी के साथ क्या हुआ।
_क्या रह सकेगा जिंदा यह जान कर कि मेडल लाने के लिए क्या क्या करना पड़ा उसे!_
_क्या इज्जत रह जायेगी हमारी समाज में!_
*_अभी तो एक बहन की शादी भी नहीं हुई और दुर्भाग्य से वो भी तो पहलवान है! क्या कोई करेगा उससे शादी अब यह जानकर कि क्या होता पहलवानों के साथ भारत में!_*
*जिस भाई ने* मेडल मिलने पर पूरे मोहल्ले में _तिरंगा लहराया था_ मिठाई बांटी थी, _अब क्या जवाब देगा वह उनको!_
_जो दोस्त उसके साथ मिलकर मेरा मैच देख रहे थे जिन्होंने दी थी अनगिनत बधाइयाँ।_
_क्या कहेगा उनसे वह?_
_क्या कल से चल सकेगा उनके साथ!_
*दिखा सकेगा किसी को मेरे भाई होने का मान!*
*_हाय! कैसे कही होगी अपनी माँ से जिसने नौ महीनों तक रखा था उसे अपनी कोख़ में_*
_क्या फफक फफक कर रो नहीं देगी वो!!!_
_कहीं बेहोश न हो जाये! बेहोश हो गई और होश नहीं आया तो, उसे तो हार्ट प्रॉब्लम कबसे है।_
_क्या कहेगी अपनी सहेलियों से जो पहले से ही उससे कहती थीं कि लड़कियों को इस तरह बाहर छोड़ना ठीक नहीं!_
*क्या कहूँगी इस समाज से इस देश से, जिसने मुझे इतना मान दिया!*
_क्या अब भी भेजेगा कोई अपनी बेटी को देश के लिए मेडल लाने के लिए?_
_क्या होगा उन लड़कियों का उनके विश्वास का यह जानकर जो मेरे जैसा बनने का सपना देखती हैं?_
_कहीं उनके घर वाले यह सुनकर उनको खेल से बाहर निकाल दिए तो।_
_कहीं ऐसा न हो कि एक साथ इतने लोगों के साथ हुए अत्याचार को देखकर देश की आने वाली लड़कियों को वंचित न कर दें उनके घर वाले खेलों से ?_
_क्या यह सुनकर शक की नजन से नहीं देखेंगे अपनी को कोई भी पति जो खेल से निकल चुकी हैं?_
*_क्या कहूँगी मैं अपने आप से!_*
जब मैं कुछ करने लायक नहीं थी तो चुप थी और चुप थीं सैकड़ों लड़कियां और न जाने कितनी थुप ही रह जाएंगी!
जब आज देश मेरी आवाज़ सुन सकता मैं बता सकती सबको अपने बारे में फिर भी अगर चुप रही तो कैसे मिलाउंगी खुद से नज़र।
_घर में रखे मेडल को देखकर जो अनगिनत प्रश्न होंगे क्या उसे यूँ ही अपने मन में दबा कर मर जाऊँगी?_
*यदि इन पहलवानों का भी जमीर मर चुका होता ! इनके भी परिवार ने न भरा होता इनमें स्वाभिमान का सागर! ये भी आ जातीं धन के लोभ में! इन्हें भी लग जाता समाज से डर! ये भी बचना चाहतीं उन अनगिनत सवालों से कि*
_उस समय क्यों नहीं बोला?_
_अब क्यों बोल रही ?_
_क्या केवल उसकी ही गलती थी?_
_तुम्हारा भी मन रहा होगा !_
_क्या इसी के बल पर मिला मेडल?_
_अचानक कैसे ज़मीर जाग उठा ?_
यदि उन्हें भी होता घर वालों के मारे जाने की धमकी का डर! इन्हें भी होता बाहर मुँह दिखाने का डर!
यदि इन्हें भी न होता महिला होने पर गर्व तो आज इन्हें इस तरह भटकना नहीं पड़ता! जो पूज्यनीय थीं कभी प्रधानमंत्री की भी, उन्हें फोल्डिंग के लिए रोना न पड़ता। *शराब के नशे में धुत्त एक पुलिसकर्मी की गाली न सुननी पड़ती।* उनका भी सम्मान होता। जब वो निकलतीं तो वही पुलिसकर्मी उन्हें सलाम करता।
_हाय! फफक फफककर ये न कहना पड़ता कि_ *क्या हम इसी दिन के लिए देश के लिए मेडल लाये थे!*
धन्य है वो माँ जो आज अपनी बेटियों के साथ खड़ी हैं नहीं तो हाय! एक भी कंधा नहीं था आज जिसपर सर रखकर वो रो सकतीं।
धन्य है वो बाप जिसने ये कहा कि मैं लड़ूँगा समाज से तेरे लिए।
*धन्य है वो पति जिसने यह सुनकर उसके आँसू पोछते हुए चूम लिया होगा उसका माथा और दिया होगा वचन उनकी इस लड़ाई में साथ रहने का !*
_और भी लिखता काश मेरे आँसू लिखने देते और दिखाई देता कीबोर्ड!
*मुझे क्या!* मुझे तो चाहिए बस एक नौकरी क्योंकि मैं भी बनना चाहता हूँ इसी समाज की उस भीड़ का एक हिस्सा जो सिर्फ कराहती है अपनी बेटी के साथ दुष्कर्म होने पर!
जो नहीं रखना चाहती मतलब किसी भी ऐसी चीज से जो उसे लाभ न दे। जो नहीं चाहती बोलना किसी के विपक्ष में जिसने सिर्फ उसका नुकसान न किया हो। मैं क्यों बोलूँ देश सिर्फ मेरा थोड़ी है! न वो बेटियाँ ही मेरी हैं जो लड़ रहीं हैं अपनी लड़ाई अकेले! मेरे घर वाले भी तो यही चाहते हैं! तुम भी तो नहीं बोले मेरी तरह! डाल लिया मौन का ताला अपने मुँह पर! जो गिनाते फिरते थे अनगिनत खूबियाँ! क्या बोलो आखिर क्या रह गया अंतर तुममे और एक जानवर में। तुम्हारी भी तो मर गईं संवेदनाएं।
सच ही कहा था अवतार सिंह पाश ने जिसे इतनी कम उम्र में खालिस्तानी अलगाववादियों द्वारा मार दिया गया!
_सबसे ख़तरनाक होता है घर से जाना काम पर,_
_और काम से लौटकर घर आना !_
*सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना!*
क्या होना था इनके साथ भी, जो कविता वर्षों से चल रही थी NCERT में उसे भी हटा दिया गया कोर्स से!
न लोगों के अंदर पड़ेगी चिंगारी न लोगों में जागेगी चिंगारी!

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